कोहली: एक अकाट्य तर्क

कोहली: एक अकाट्य तर्क 
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बादल अच्छे भले सूरज को क़ैद कर लेते हैं। तीरगी घनी हो तो तेज़ चमकते हुए सितारे रौशनी की गुहार लगाते हैं। नदी का पानी जलने लगे तो अच्छी भली मछलियांँ पानी - पानी हो जाती हैं। हवा बहुत तेज़ चलने लगे तो बड़े बड़े पंछी आसमान छोड़कर हवा हो जाते हैं। समय की धार उलट जाए तो महामानव तक के पसीने आ जाते हैं। कहने का अर्थ यह कि प्रतिकूलता सब पर एक तरह का असर डालती है। सबको सोचने पर विवश करती है। तोड़ कर रख देती है। कभी कभी तो बिल्कुल शून्य कर देती है।

कोहली इस समय प्रतिकूलता के चक्र में हैं। समय उनके गुण और संयम की परीक्षा ले रहा है। वो भली भांति इस परीक्षा में रत हैं। लगातार कोशिश कर रहे हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि वो लय में नहीं हैं - उनकी लय जा चुकी है - उनमें अब वो वाली बात नहीं रही - उनमें अब बहुत ज़्यादा क्रिकेट नहीं रही वगै़रहा, वगै़रहा। मुझे इनमें से कोई भी व्याख्या सम्पूर्ण नहीं लगती है। जिस कोहली को मैं जानता हूंँ वो अपने लिए ख़ुद कठिन रास्ते चुनता है ताकि वो और बेहतर बन सके। आप पिछले दो सालों में भारतीय टीम मैनेजमेंट का रवैया देखें। टीम मैनेजमेंट बदलती क्रिकेट के साथ भारतीय क्रिकेट को बदलने में लगा है। सादे से सादे खिलाड़ी को आक्रमकता की धुन पर नचाना चाहता है। आपको हैरानी होगी लेकिन इस धुन को रवांँ करने का ज़िम्मा उसी कोहली ने उठाया है जिसे लोग ऑउट ऑफ़ फॉर्म बता रहे हैं। पिछले दो सालों का कोहली बल्लेबाज़ी करने आता है और लगभग हर बार पहली दो गेंदों पर आक्रामक शॉट खेलने की कोशिश करता है। कई बार सफल होता है तो कई बार असफल रह जाता है। आप ज़रा सा अपने दिमाग़ पर ज़ोर लगाएंँगे तो याद आएगा कि वो सारे शॉट कमाल के थे - सब पर किसी पैरलल यूनिवर्स (2016 वाला कोहली) के कोहली की छाप लगी थी। कोहली जब जब इन दो सालो में ऑउट हुए - उनके चेहरे पर एक अप्रतिम मुस्कान थी। मानो उन्हें अपनी कोशिश पर गर्व महसूस हो रहा हो या वो यह समझ चुके हों कि जीत जाने में और कोशिश करके हार जाने में कोई फ़र्क़ नहीं होता।

कोहली क्रिकेट की सभागार में बल्लेबाज़ी विषय पर रखा हुआ एक अकाट्य तर्क है। उसे काउंटर करना ना मुमकिन है। वो यहीं कहीं है, वो कहीं नहीं गया और अगर गया भी हो तो -

मेहरबाँ हो के बुला लो उसे चाहो जिस वक़्त 
वो गया वक़्त नहीं है कि फिर आ भी न सके


:- उत्कर्ष सिंह

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