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Showing posts from January, 2024

स्टोक्स और जडेजा

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स्टोक्स और जडेजा - टेस्ट क्रिकेट की प्रकृति में समय के साथ बदलाव हुए हैं। अलग अलग क्रम पर खेलने वाले बल्लेबाज़ों की भूमिकाएंँ बदल गईं। गेंदबाज़ों के साथ भी कमोबेश ऐसा ही हुआ। लेकिन हर फन मौला खिलाडियों की भूमिका इस बदलाव से कोसों दूर है। हरफ़न मौला खिलाड़ी आज भी पांँचवे गेंदबाज़ और सातवें बल्लेबाज़ की भूमिका में है।  स्टोक्स और जडेजा हरफ़न मौला शब्दकोष के शुरुआती दो नाम हैं। बल्लेबाज़ी की बात करें तो दोनों बाएंँ हाथ के बल्लेबाज़ हैं। दोनों मूल रूप से आक्रमक हैं लेकिन समय - समय पर रक्षात्मकता को भी साधते रहते हैं। दोनों फ्रंटफुट पर अच्छा खेलते हैं । छोटी गेंदों पर स्टोक्स ज़्यादा सहज हैं। कट दोनों अच्छा खेलते हैं लेकिन जडेजा का कट अधिक दर्शनीय है। गेंदबाज़ी की बात करें तो स्टोक्स दाहिने हाथ के मीडियम पेसर हैं। जडेजा बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स स्पिनर हैं। दोनों अपनी अपनी प्रकृति के शानदार गेंदबाज़ हैं। स्टोक्स आज कल गेंदबाज़ी नहीं कर रहे हैं वही जडेजा लगातार गेंदबाज़ी कर रहे हैं। क्षेत्ररक्षण में दोनों लगभग एक जैसे हैं। ग्राउंड फील्डिंग में जडेजा थोड़े बेहतर हैं ...

न खिलाड़ी हारता है, न खेल

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  सिनर और नियमितता  सिनर हर एक रिटर्न के बाद विपक्षी खिलाड़ी की ओर बढ़ते रहते हैं। ऐसा करने से उनके रिटर्न में तेज़ी आती है और विपक्षी खिलाड़ी को मुश्किल होती है। वो लम्बी रैलियों में पीछे रहकर भी खेलते हैं। पीछे रहकर डीप रिटर्न्स करते हैं जिस से विपक्षी खिलाड़ी को शॉट मेकिंग में परेशानी होती है। अपने खेल में ऐसी तकनीकी निरंतरता सिनर को ख़ास बनाती है। कार्लोस अल्कराज ने सिनर की मेलबर्न जीत पर लिखा है - ‘तुम्हारे लिए बहुत खुश हूंँ, तुम इस ट्रॉफी के सच्चे हक़दार हो, बधाई मेरे दोस्त ‘। यहांँ कार्लोस और सिनर की तुलना जैसा कुछ नहीं हैं लेकिन सिनर की नियमितता ही उन्हें हार्ड कोर्ट पर कार्लोस और 'बाक़ी खिलाड़ियों' से बेहतर बनाती है।  मेदवदेव और समय  'बाक़ी खिलाड़ियों' में मेदवेदेव नहीं हैं। मेदवदेव 4 बार ग्रैंड स्लैम चैंपियन होते होते रह गए हैं। वो इसलिए नहीं हारते कि उनका खेल किसी भी तरह से कमज़ोर है। बैक हैंड पर बहुत अच्छे हैं। लंबी रैली में सहज रहते हैं। फोरहैंड भी बुरा नहीं है। सर्व अच्छी करते हैं। मेरे जानने में, हार्ड कोर्ट पर मेदवदेव जैसा खेल किसी के पा...

दूसरा टेस्ट : बादल को घिरते देखा है

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दूसरा टेस्ट, पहला दिन : तमाशा मेरे आगे  ---- भारतीय टीम पहला मैच पारी से हारी थी। ऐसी स्तिथि में दबाव महसूस करना स्वाभाविक था। प्री मैच कांफ्रेंस में सब दम भरते हैं : रोहित भी वही कर रहे थे। लेकिन मैच जब शुरू हुआ तब समझ आया कि रोहित सिर्फ़ दम नहीं भर रहे थे। उनकी टीम हर हालत में जीतने ही आई थी। वैसे भी , अगर सिराज की गेंद सही जगह गिरने लग जाए तो यह भी फ़ैक्ट है कि विकेट्स निकलते देर नहीं लगती है। एक छोर से सिराज तो दूसरे छोर से बुमराह और मुकेश, अफ़्रीकी बल्लेबाज़ों पर टूट गिरे। अफ़्रीकी पारी नाटकीय ढंग से 55 रनों पर ढेर हो गई।  अब भारतीय टीम बल्लेबाज़ी करने उतर रही थी। पिच का रवैय्या सभी देख चुके थे। सब को ख़बर थी कि यह पारी भी बहुत लंबी नहीं होने वाली है। लेकिन रोहित शर्मा को कानो - कान भी ख़बर नहीं थी। उन्होंने बल्लेबाज़ी शुरू की तो लगा कि यह टिपिकल अफ़्रीकन पिच है - जिसकी उछाल और गति पर भरोसा किया जा सकता है। हालांँकि दूसरी तरफ़ से ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। सभी खिलाड़ी इस पिच पर असहज महसूस कर रहे थे। कोहली को भी शुरू में थोड़ी परेशानी हुई लेकिन हमेशा की तरह उन्हों...