e-Sports : The Change Is Here






किसी व्यक्ति विशेष के संदर्भ में, बदलाव को स्वीकार न करना रूढ़िवादिता की सरलतम परिभाषा है। जमे रहना रूढ़िवादिता का सबसे बड़ा प्रतीक है। बदलाव के बारे में सबसे ख़ास बात यह है कि इसको अपनी दशा प्राप्त करने में समय लगता है लेकिन यह अतिरेक प्राप्त करके ही दम लेता है। एक पूरी पीढ़ी का एक क़दम दूसरी पीढ़ी के लिए बदलाव के रास्ते खोलता है। उसी पीढ़ी के कुछ जमे हुए लोग बढ़ते हुए क़दम को पीछे खींचते हैं। इतिहास ऐसे लोगों को मुआफ़ नहीं करता है। अगली पीढ़ी जब ऐसे लोगों से सवाल करती है तब वे भी ख़ुद को मुआफ़ नहीं कर पाते हैं। हर पिछली पीढ़ी को लगता है कि उन्हें बदलाव को रोकना ही चाहिए और वो बदलाव को रोक सकते हैं। लेकिन चेंज कॉन्स्टेंट हैं। होकर रहता है। होकर ही रहता है।

मोबाईल गेमिंग और कंप्यूटर गेमिंग का इतिहास लगभग 20 साल पुराना है। भारत में इंटरनेट ने पिछले 6-7 सालों में तेज़ी से अपने पांँव पसारे हैं। मोबाइल और कम्प्यूटर गेमिंग जब इंटरनेट की मदद से रियल टाइम में होने लगी तो इसे ई - गेमिंग कहा गया। हालांकि ई को कुछ कुछ जगहों पर इलेक्ट्रानिक शब्द से भी जोड़कर देखा जाता है। ई -गेमिंग को जब लोगों ने नाम और पैसों का विकल्प बनाया तो ई -गेमिंग, ई स्पोर्ट्स कहलाने लगी। आज से 10- 15 साल पहले, घर बैठे बैठे देस विदेस के खिलाड़ियों से किसी एक गेम के माध्यम से लोहा लेना सपना ही लगता रहा होगा। लेकिन बदलती दुनिया ने सपने को सच में तब्दील कर दिया है।

इस समय भारत में ई स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के चारो हाथ घी में हैं। बी जी एम आई (BGMI), वैलोरेंट (VALORENT) जैसे गेम्स युवाओं के लिए एक नया करियर बनकर उभर रहे हैं। नई नई ई स्पोर्ट्स संस्थाएंँ ( orgs) आए दिन जन्म ले रहीं हैं और नए नए खिलाड़ी अपना लोहा मनवा रहे हैं। दो एक दिन पहले बी जी एम आई (bgmi) का एक टूर्नामेंट ख़त्म हुआ। यह अपने आप में ऐसा पहला टूर्नामेंट बना जिसे भारतीय टेलीविज़न ने लाइव प्रसारित किया। इससे पहले ऐसे टूर्नामेंट यूट्यूब पर प्रसारित किए जाते थे। स्टार स्पोर्ट्स ग्रुप ने इस प्रसारण की ज़िम्मेदारी ली और हमेशा की तरह बदलाव की ओर पहला क़दम बढ़ाया। ई स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को स्टार जैसी बड़ी संस्था का ऐसा सहयोग मिलना एक ख़बर है। हालांकि कोई बड़ा न्यूज़ चैनल या समाचार पत्र इसे ख़बर में नहीं गिनेगा। उठ रही आवाज़ को आवाज़ न मानना रूढ़िवादिता है और रूढ़िवादिता बदलाव के सामने एक न एक दिन हार ही जाती है।

फ़ील्ड स्पोर्ट्स को पसंद करने वाले ज़ियादातर लोग मोबाईल गेमिंग को नकार देते हैं। तर्क भी रखते हैं। कहते हैं इसमें कैसी मेहनत है, फोन में खेलना है, बन्दूक ही चलानी है, बच्चों को लत लगती है, मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है, हिंसक मानसिकता को बढ़ावा मिलता है ........। इनमें से कई तर्क सटीक भी हैं । लेकिन अगर उनसे कोई कहे कि क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी जैसे तमाम ऑउट फील्ड स्पोर्ट्स में खिलाड़ी कितने आक्रामक हो जाते हैं, अपशब्द बोलते हैं, घातक चोट लगने का खतरा रहता है, ख़राब फ़ॉर्म मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है और सेट ऑफ़ प्ले ही तो है इसमें ख़ास क्या है.......? कुल मिलाकर बात यह है कि हर एक खेल माध्यम की अपनी कमियांँ हैं, अपनी विशेषताएंँ हैं। अनुशासन और नियमों से चला जाए तो हर खेल और हर खेल माध्यम का अपना महत्व है। और हर खेल उसके खेलने वालों को हर तरह से भरपूर इंसान बनाने का माद्दा रखता है।

ई स्पोर्ट्स भविष्य है और हमें अपनी दोनों भुजाएँ खोलकर इसका स्वागत करना चाहिए। शायद करना ही होगा।


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