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e-Sports : The Change Is Here

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किसी व्यक्ति विशेष के संदर्भ में, बदलाव को स्वीकार न करना रूढ़िवादिता की सरलतम परिभाषा है। जमे रहना रूढ़िवादिता का सबसे बड़ा प्रतीक है। बदलाव के बारे में सबसे ख़ास बात यह है कि इसको अपनी दशा प्राप्त करने में समय लगता है लेकिन यह अतिरेक प्राप्त करके ही दम लेता है। एक पूरी पीढ़ी का एक क़दम दूसरी पीढ़ी के लिए बदलाव के रास्ते खोलता है। उसी पीढ़ी के कुछ जमे हुए लोग बढ़ते हुए क़दम को पीछे खींचते हैं। इतिहास ऐसे लोगों को मुआफ़ नहीं करता है। अगली पीढ़ी जब ऐसे लोगों से सवाल करती है तब वे भी ख़ुद को मुआफ़ नहीं कर पाते हैं। हर पिछली पीढ़ी को लगता है कि उन्हें बदलाव को रोकना ही चाहिए और वो बदलाव को रोक सकते हैं। लेकिन चेंज कॉन्स्टेंट हैं। होकर रहता है। होकर ही रहता है। मोबाईल गेमिंग और कंप्यूटर गेमिंग का इतिहास लगभग 20 साल पुराना है। भारत में इंटरनेट ने पिछले 6-7 सालों में तेज़ी से अपने पांँव पसारे हैं। मोबाइल और कम्प्यूटर गेमिंग जब इंटरनेट की मदद से रियल टाइम में होने लगी तो इसे ई - गेमिंग कहा गया। हालांकि ई को कुछ कुछ जगहों पर इलेक्ट्रानिक शब्द से भी जोड़कर देखा जाता है। ई -गेमिंग को...

अद्वितीय जसप्रीत

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जो रूट स्ट्राइक पर हैं। बुमराह लगातार गुड लेंथ पर गेंदबाज़ी कर रहे हैं। पहली गेंद पांचवें स्टंप की लाइन में  गिरकर रूट की तरफ़ आती है। रूट आसानी से खेलते हैं। दूसरी गेंद भी लगभग वहीं गिरती है और जो रूट की तरफ़ आती है। रूट दुबारा आसानी से खेलते हैं। गेंद प्रति गेंद बुमराह पांचवें स्टंप से चौथे स्टंप की ओर आते रहते हैं। जो रूट पहले की तरह आसानी से खेल रहे  होते हैं। अचानक गेंद चौथे स्टंप पर गिरने के बाद पांचवें स्टंप की ओर सीम हो जाती है और जो रूट धराशाई हो जाते हैं। गेंद उनके बल्ले को चूमती हुई विकेट कीपर के दस्तानों में पहुँच जाती है।  बुमराह का नैसर्गिक कोण अंदर की ओर है। वो बिना रुके अंदर आने वाली गेंद डाल सकते हैं और डालते रहते हैं। ऐसे में बल्लेबाज़ उनकी अंदर की ओर आने वाली गेंद के लिए तैयार रहता है। सब कॉन्टिनेंट की पिच पर बल्लेबाज़ निश्चिंत हो कर यह काम कर सकता है। क्योंकि ऐसी पिच पर गेंद को बाहर ले जाना बहुत मुश्किल काम है। लेकिन बुमराह गुणी गेंदबाज़ हैं। उन्होंने इस मुश्किल को अपने लिए आसान कर लिया है। लेकिन आसान होने का अर्थ यह नहीं कि वो लगातार इस गे...

स्टोक्स और जडेजा

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स्टोक्स और जडेजा - टेस्ट क्रिकेट की प्रकृति में समय के साथ बदलाव हुए हैं। अलग अलग क्रम पर खेलने वाले बल्लेबाज़ों की भूमिकाएंँ बदल गईं। गेंदबाज़ों के साथ भी कमोबेश ऐसा ही हुआ। लेकिन हर फन मौला खिलाडियों की भूमिका इस बदलाव से कोसों दूर है। हरफ़न मौला खिलाड़ी आज भी पांँचवे गेंदबाज़ और सातवें बल्लेबाज़ की भूमिका में है।  स्टोक्स और जडेजा हरफ़न मौला शब्दकोष के शुरुआती दो नाम हैं। बल्लेबाज़ी की बात करें तो दोनों बाएंँ हाथ के बल्लेबाज़ हैं। दोनों मूल रूप से आक्रमक हैं लेकिन समय - समय पर रक्षात्मकता को भी साधते रहते हैं। दोनों फ्रंटफुट पर अच्छा खेलते हैं । छोटी गेंदों पर स्टोक्स ज़्यादा सहज हैं। कट दोनों अच्छा खेलते हैं लेकिन जडेजा का कट अधिक दर्शनीय है। गेंदबाज़ी की बात करें तो स्टोक्स दाहिने हाथ के मीडियम पेसर हैं। जडेजा बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स स्पिनर हैं। दोनों अपनी अपनी प्रकृति के शानदार गेंदबाज़ हैं। स्टोक्स आज कल गेंदबाज़ी नहीं कर रहे हैं वही जडेजा लगातार गेंदबाज़ी कर रहे हैं। क्षेत्ररक्षण में दोनों लगभग एक जैसे हैं। ग्राउंड फील्डिंग में जडेजा थोड़े बेहतर हैं ...

न खिलाड़ी हारता है, न खेल

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  सिनर और नियमितता  सिनर हर एक रिटर्न के बाद विपक्षी खिलाड़ी की ओर बढ़ते रहते हैं। ऐसा करने से उनके रिटर्न में तेज़ी आती है और विपक्षी खिलाड़ी को मुश्किल होती है। वो लम्बी रैलियों में पीछे रहकर भी खेलते हैं। पीछे रहकर डीप रिटर्न्स करते हैं जिस से विपक्षी खिलाड़ी को शॉट मेकिंग में परेशानी होती है। अपने खेल में ऐसी तकनीकी निरंतरता सिनर को ख़ास बनाती है। कार्लोस अल्कराज ने सिनर की मेलबर्न जीत पर लिखा है - ‘तुम्हारे लिए बहुत खुश हूंँ, तुम इस ट्रॉफी के सच्चे हक़दार हो, बधाई मेरे दोस्त ‘। यहांँ कार्लोस और सिनर की तुलना जैसा कुछ नहीं हैं लेकिन सिनर की नियमितता ही उन्हें हार्ड कोर्ट पर कार्लोस और 'बाक़ी खिलाड़ियों' से बेहतर बनाती है।  मेदवदेव और समय  'बाक़ी खिलाड़ियों' में मेदवेदेव नहीं हैं। मेदवदेव 4 बार ग्रैंड स्लैम चैंपियन होते होते रह गए हैं। वो इसलिए नहीं हारते कि उनका खेल किसी भी तरह से कमज़ोर है। बैक हैंड पर बहुत अच्छे हैं। लंबी रैली में सहज रहते हैं। फोरहैंड भी बुरा नहीं है। सर्व अच्छी करते हैं। मेरे जानने में, हार्ड कोर्ट पर मेदवदेव जैसा खेल किसी के पा...

दूसरा टेस्ट : बादल को घिरते देखा है

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दूसरा टेस्ट, पहला दिन : तमाशा मेरे आगे  ---- भारतीय टीम पहला मैच पारी से हारी थी। ऐसी स्तिथि में दबाव महसूस करना स्वाभाविक था। प्री मैच कांफ्रेंस में सब दम भरते हैं : रोहित भी वही कर रहे थे। लेकिन मैच जब शुरू हुआ तब समझ आया कि रोहित सिर्फ़ दम नहीं भर रहे थे। उनकी टीम हर हालत में जीतने ही आई थी। वैसे भी , अगर सिराज की गेंद सही जगह गिरने लग जाए तो यह भी फ़ैक्ट है कि विकेट्स निकलते देर नहीं लगती है। एक छोर से सिराज तो दूसरे छोर से बुमराह और मुकेश, अफ़्रीकी बल्लेबाज़ों पर टूट गिरे। अफ़्रीकी पारी नाटकीय ढंग से 55 रनों पर ढेर हो गई।  अब भारतीय टीम बल्लेबाज़ी करने उतर रही थी। पिच का रवैय्या सभी देख चुके थे। सब को ख़बर थी कि यह पारी भी बहुत लंबी नहीं होने वाली है। लेकिन रोहित शर्मा को कानो - कान भी ख़बर नहीं थी। उन्होंने बल्लेबाज़ी शुरू की तो लगा कि यह टिपिकल अफ़्रीकन पिच है - जिसकी उछाल और गति पर भरोसा किया जा सकता है। हालांँकि दूसरी तरफ़ से ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। सभी खिलाड़ी इस पिच पर असहज महसूस कर रहे थे। कोहली को भी शुरू में थोड़ी परेशानी हुई लेकिन हमेशा की तरह उन्हों...

इक नज़र मेरी तरफ़ भी : भारत बनाम दक्षिण अफ़्रीका, पहला टेस्ट

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पहला टेस्ट, पहला दिन : यही सच है रोहित छोटी गेंद पर ऑउट हुए। यशस्वी ड्राइव मारने गए। शुभमन लेग ग्लांस करना चाहते थे। बर्गर एक अच्छे गेंदबाज़ बनेंगे। आक्रामकता तलवार है : दो धारी: यही सच है।  श्रेयस भी आक्रामक दिखे। कोहली भी एकदम सहज लगे। दोनों को एक एक मौक़ा मिला लेकिन यही तो क्रिकेट है। दोनों बेहद शानदार गेंदों पर ऑउट हुए। रबाड़ा विशुद्ध गेंदबाज़ हैं : बिल्कुल पहले की तरह: यही सच है। राहुल और शार्दूल ने तो जैसे पलटवार किया। अचानक से खेल की रफ़्तार ही बदल गई। शार्दूल ने एक बाउंसर हेलमेट पर खाया। उसके कुछ ही देर बाद वापिस लौट गए। ओअश्विन की भी कहानी लगभग यही रही। लेकिन राहुल बेहतर हुए हैं : बदलाव के बावजूद: यही सच है।  Play it tough, all the way. Grind them into the dust. — Donald Bradman पहला टेस्ट, दूसरा दिन : व्यक्ति आधारित समूह  राहुल आज-कल बहुत अच्छा खेल रहे हैं। रबादा जैसे गेंदबाज़ का सामना अकेले प्रतिभा के बस का नहीं है। तकनीक और धैर्य के साथ साथ अब उन की समझ भी अच्छी हो गई है। अब उनके पास सेंचुरियन में दो शतक हैं। इस पारी में भारत के 41 प्रत...

खेलों में कुछ भी अचानक नहीं होता

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"तेज़ हो जाएँ इस का तो इम्कान है आँधियाँ अब रुकें, ऐसा लगता नहीं" - आशुफ़्ता चंगेज़ी  दर्ज कर लेने की बौखलाहट जीत लेने (की बौखलाहट) जैसी ही होती है। जहांँ आप, जल्द अज़ जल्द सारा क़िस्सा चंद लफ़्ज़ों में समेट लेना चाहते हैं। वहीं, मैदान पर खिलाड़ियों को मैच ख़त्म करने की जल्दी रहती है ।  हालांँकि कई मारके आसानी से सर नहीं होते। हर तरह की कोशिश मिट्टी हो जाती है। लेकिन एक ऐसा भी दिन आता है जब आप सब कुछ अपने हिसाब से लिखते हैं। खिलाड़ी, खेल की हर शक्ल अपने मन मुताबिक़ तय करता है।   अफ़ग़ानिस्तान, नीदरलैंड्स और ह्यूबर्ट हरकाज़ के लिए पिछला हफ़्ता इसी दिन की तरह गुज़रा है। उनके लिए, खेल का एक-एक पल, एक-एक दांँव, पहले से बीता हुआ - पहले से खेला हुआ लग रहा था।  तीनों मैच से पहले लेस फेवरिस्ट्स और मैच के दौरान मोर प्रिपेयर्ड थे। तीनों के सामने बड़ी - बड़ी चुनौतियांँ थीं। तीनों ने अपना सबसे अच्छा खेल खेला और जीत हासिल की।  तीनों की जीत अपनी अपनी जगह पर एक 'स्टेटमेंट' है। जाते हुए साल में तीनो ने अपने लिए एक 'मोमेंट' जीता है।   हरकाज...